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Friday, February 1, 2008

जिस को समझा था तू ने रकीब,वो तेरा नसीब था

तेरे नाम की थी जो रौशनी उसे खुद तुने बुझा दीया
जिस्सको जला सकी थी न धुप उसे चांदनी ने जला दीया

में हूँ गर्दिशों का मारा हुवा मुझे अब अपनी खबर नही
वो जो शख्स था मेरा रहनुमा उसे रास्तों मी गंवा दीया

जिस को समझा था तू ने रकीब,वो तेरा नसीब था
तेरे हाथ की लकीर था,उसे तू ने हाथ से ही मिटा दीया

मुझे इश्क है के जूनून, ये फैसला कभी न हो सका
मेरा नाम जीनत-ए-दस्त था,इसे आँधियों ने मिटा दीया

ये उदासियू का जमाल हा , के मरैव्ज-ए-कमल है
के कभी जात से भी चुप लिया, टू कभी शहर भर को सुना दीया

मेरी उम्र का गुलिस्तान अभी खुला हुवा है ज़रूर पर
वो जो फूल थे तेरी छह के उनको मौसमों ने गिरा दीया

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