मुझसे पूछो...
तुम सूनी आंखो को देख कर डरते हो,
मुझसे पूछो आंखें बेजान क्या होती है.
देखा होगा तुमने लोगों को दर्द के साथ मुस्कुराते हुए,
मुझसे पूछो आँसुओ के साए मी मुस्कान क्या होती है.
राहों के पत्थर भी अब गैरत से देखने लगे है,
मुझसे पूछो खोयी हुई पहचान क्या होती है.
रेत के महल कि तरह बिखर गयी ख्वैस्हें डिल कि,
मुझसे पूछो अरमानों कि दुनिया विरान क्या होती है.
जाने वाला तो अपने कदमो के निशान भी मिटा गया,
मुझसे पूछो इंतज़ार मी आंखें निगेहबान क्या होती है.
युही मंजूर नही कर लेटा कोई दर्द के साथ जीना,
मुझसे पूछो तकलीफ टूटने पर एक अरमान क्या होती है.
तुम्हे टोह मरने के बाद आंसू बहाने का मौका भी नही मिलेगा,
मुझसे पूछो डिल मी अस्कों से भीगी शमशान क्या होती है...
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