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Friday, February 1, 2008

दर्द बनकर रह गया.......

खुदा से मैंने जिन खुशिओं की मन्नतें मांगी
उन्ही खुशियों की टू उसने मैयातें उठा दी

जिन ख्वाबों को डिल मी सजा कर रखा
उन्ही ख्वाबों की उसने अर्थी सजा दी

सुना था की खुदा हर मुश्किल मी साथ निभाता है
पर आज इसने हमारा साथ क्यों छोड़ दीया

इतने सवाल खडे किये इस डिल मी इसने
टू आज उन्ही सवालों का जवाब देने से मुंह क्यों मोड़ दीया

वो टू तू ही था न जिसकी मैंने पूजा की थी
फिर आज क्यों तू पत्थर का बन कर रह गया

उम्मीदें बनकर मेरी इस जिंदगी में
आज उन्ही क साथ पानी बनकर बह गया

क्या किया था मैंने ऐसा
जिसकी सजा तुने मुझे दी है

जिसको चाह मैंने इतना
अज वो इस डिल मी दर्द बनकर रह गया

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नरम आवाज़ भली बातें पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं ,
दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं ।
ज़ख्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते है ,
दर्द के फूल भी खीलते हैं बीखर जाते हैं


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यू ही तलाश करते हो तुम वफ़ा का नाम
यहाँ दुनिया मी इस नाम की कोई चीज नही है मिलती

ये है दुनिया अजब सी रंगो मी रंगी हुयी
यहाँ कभी किसी को अपनी पसंद की मंजिल नही मिलती

एक बहाना है बस ये की हम मुस्करा देते हैं यू ही
वरना गौर से देखो यहाँ लबो पेर अब हंसी भी नही मिलती !!

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मेरे लाफजो मे बयान मेरा ही अफसाना है
अब मैं तुझसे कैसे कहू की तू इस से अनजाना है

छिपे हैं मेरी मुस्कराहट मी अभी कुछ दर्द नए
तेरे लबो पर हंसी है टू मुझे भी मुस्कुराना है

मर चुके हैं हम टू अपनी मौत से पहले
अब किस तरह कहे की इस ज़िंदगी को जी के जान है

दवा करे अब हम अपने किस किस दर्द की यहाँ
यहाँ हर दवा ने भी मुझे दर्द ही दे जान है

जाते जाते मेरी राहों से मुझे आवाज़ न देना
बहक न जाये मेरा डिल फिर से ये टू दीवाना है !!

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तुझसे बिचार के मेरा वजूद भी कहाँ है
इस डिल की दीवारों मे आहें हैं और सिसकियाँ है

मैं राहू कही भी इस दुनिया मे
बस तू ही तू मेरे साँसों के दरमियाँ है

है खबर कहाँ अब अपनी तनहाइयों की
बस तेरी ही यादो का काफिला अब यहाँ है

बिछी हुई है सब तरफ एक खामोशी की चादर
फिर भी तेरी सादाओ का मेहेकता बागबान यहाँ है

दिकहो न सपने हमे उस दुनिया के अब तुम सनम
जहा हकीकत है कम और खावाबो से रोशन सारा जहाँ है

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