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Saturday, March 1, 2008

खामोश दील की कहानी थी,गुमसुम सी आखो की जुबानी थी.
मैं कहता था आखो मैं आसू है वो कहती थी की बारीश ka पानी है.
कहने को वो अकसर खुश रहती थी पर अकसर रातो मैं तारो से कुछ कहती थी
कुछ छुपा था दील मैं उसके,दर्द था शायेद या कोई अधूरी कहानी थी

ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ


जब से मीले हो तुम मैं एक उमर जी गया
तेरी ज़ुल्फ़ के साए मैं मेरा इमान भी गया
तसवीर तेरी दील मैं इस कदर उतर गयी
के शराब मैं शबाब तेरा मीला के पी गया।

ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ

दूर रह कर पास रहा hai बनकर दील मैं अहएससे रहा hai.
खफा हू mager बेवफ्फा मैं नही है,जुदा होकर भी तुझेसे जुदा मैं नही हू.

तेरी चाहत आज भी कही दील मैं रहती hai,करता rahu तुझेसे वफ़ा ये कहता hai.
दर्द को दील मैं छूपय तो पर ये आखो मैं आसू बनकर चला आता hai


ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ______ஜॐ♥ஜ

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