उल्जन को सुल्जाये कैसे...
यह कैसी उल्जान हे डिल मैं…इन उल्जनो को सुल्जाये तो सुल्जाये कैसे….
तुम बिन जीना होगा
डिल को बताये तो बताये कैसे….
तेरी यादों को डिल से
निकले तो निकले कैसे…..
हम तुम बिन अधूरे हैं
रहे तो कैसे रहे यूं अधूरे…..
तेरे होने के उस एहसास को…..
तेरे साँसों कि खुशबू को…..
तेरी उन बातों को, तेरे उन वादों को…..
तेरे साथ गज़रे उन लम्हों को….
तेरा उन प्यार भरी निगाहों को…
तेरी उन अदाओं को,
तेरे उन ख्यालों को….
भूले तो भूले कैसे…..
तेरे बिन ज़िंदगी, ज़िंदगी ही नही,
इसे जीए तो जीए कैसे…..
अधूरी सी है साँसें बिन तेरे ,
अधूरी साँसों को रोल तो रोके कैसे….
डिल को धड़क ने से रोके तो रोके कैसे…
बेचन डिल को
बहलाए तो बहलाए कैसे….
जीए तो कैसे जीए बिन तेरे..
इन उल्जनो को सुल्जाये तो सुल्जाये कैसे……
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आपकी उलझन तोह बहुत ही खूबसूरत लगती है, सुल्जी
हुई जिन्दाही से उलझी हुई ज़िंदगी प्यारी लगती है।
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नाराज़ हूँ
न अपनी तकदीर से नाराज़ हूँ,
न उस खुदा से नाराज़ हूँ,
खीच दी जिनसे खुद मेने अपने हथोंकी लकीरें
आज उस कलम कि सियाही से नाराज़ हूँ
न उसकी बेवफाई से नाराज़ हूँ
न उसके दिए हुए दर्द से नाराज़ हूँ
जो दर्द खुद मैंने अपने दामन से लगा लिए
आज वो दामन के दागदार होने से नाराज़ हूँ
चल तो दिया तू एक ही पल मी मुझसे कह कर अलविदा
न सोचा मेरी ज़िंदगी का अंजाम क्या होगा तेरे बिना
न तेरे जाने से न अपने अंजाम से नाराज़ हूँ
बस अपनी शिक़ायत न करने कि फितरत से नाराज़ हूँ
मोहब्बत मेरी कभी होगी नही पूरी ये पता था
ख्वाब देखे थे उसे पाने कि उसके किसी ग़ैर के होजाने के बाद भी
न उसके अधूरेपन से न उन हसीं ख्वाबों से नाराज़ हूँ
बस जो डिल ने किया साँसों से समझौता उसी समझौते से नाराज़ हूँ
मेरे काफिले को मंजिल न मिलना मुक़र्रर था
तेरा मुझसे बेरुखी करना था बरक़रार
न तेरी मंजिलों से न ही बेरुखियों से नाराज़ हूँ
जो बनायीं रास्तोंके खोने के बावजूद उस मंजिल से नाराज़ हूँ
यादें तेरी हर लम्हा अश्कों का तूफ़ान लिए आती है
तेरी आहात कि चाह से ही रूह मेरी तड़प सी जाती है
न उन यादों से न उन लम्हों से न उन अश्कों से नाराज़ हूँ
जिन्होंने समायी तेरी हर धड़कन उनमे उन धडकनों से नाराज़ हूँ
खुदा ने दिया हर मोड़ पर मुझे तेरी बेवफाई का इल्म
बसाए बैठे थे फिर भी ख्वाबोंका हसीं ताजमहल
न उस खुदा से न तेरी बेवफाई से न ही उन ख्वाबोंसे नाराज़ हूँ
अपना समझा था तुझे और सिर्फ तुझे ही जहाँ मी,
और तुने ही जार जार किया मेरी रूह को
इसलिए मैं आज खुद अपने आपसे ही नाराज़ हूँ...
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गर बिकते घाम और ख़ुशी बाज़ार में, तोह कीमत न होती ख़ुशी कि इस संसार में,
गर हो जाता प्यार का इकरार पेल भर
में, तोह सचे दोतों उन्ही रहते राहों मैं,
गर न मिलता दर्द इनकार का, कहा मिलता सच्चा दोस्तिस जहाँ में....
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